Coffee with Krishna -- pustak samiksha : Atulya Khare

 

pustak samiksha : Atulya Khare  

समीक्षित पुस्तक : कॉफी  विद कृष्ण

द्वारा : भरत गढ़वी

FLYDREAMS  पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित

प्रथम संस्करण : सितंबर 2023

मूल्य : 220.00पुस्तक

 समीक्षा क्रमांक :102

कॉफी विद कृष्ण का front cover


 युवा साहित्यकार भरत गढ़वी साहित्य के क्षेत्र में सद्य उदित सशक्त हस्ताक्षर हैं जिन्होनें अपनी विविधता एवं शैली के चलते पाठक वर्ग पर छाप छोड़ी है विशेषतौर पर युवाओं के बीच में अपने कार्य हेतु बखूबी पहचाने जाते हैं। पूर्व में उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई जिनमें “ ज़िन्दगी स्टोर”, उनकी शेरो-शायरी का संग्रह है जिसके ज़रिये उन्होंने साहित्य की इस विधा में भी अपनी आमद दर्ज करवा दी है जबकि उसके पूर्व उन्होंने तीन युवतियों की कहानी के माध्यम से  युवाओं के सपनों एवं उनकी उड़ानों पर केन्द्रित एक उपन्यास “ड्रीम जर्नी “ प्रस्तुत किया था जिसे सुधि पाठकों विशेष तौर पर युवा वर्ग का अच्छा प्रतिसाद मिला था।

गढ़वी जी की यह मात्र  तीसरी ही पुस्तक है किंतु जिस परिपक्वता एवं लेखन क्षमता का परिचय उन्होंने दिया है वह काबिले तारीफ होते हुए, उनके उज्ज्वल भविष्य का द्योतक भी है । उनकी पिछली दोनो पुस्तकों को भी मैने पढ़ा है एवं निश्चय ही कहा जा सकता है की इस पुस्तक में उन्होंने उल्लेखनीय प्रगति करी है। बात कथानाक के विस्तार की हो या प्रस्तुति की  अथवा पाठक को बांध कर रखने की कला की , सभी उत्तम दर्जे के हैं । वाक्य छोटे ही हैं किंतु स्पष्ट एवं बिना किसी भारी भरकम शब्दावली के इस्तेमाल के किंतु अपनी बात पाठक तक पहुंचने में बखूबी कामयाब।

कॉफी विद कृष्ण का back  cover

समीक्ष्य पुस्तक का नाम ही रोचकता का प्रारंभ कर देता है , पुस्तक  शुरू करने के पूर्व लगा की कहीं यह इसी तरह की किसी फिल्म से प्रभावित कथानक तो नहीं किंतु जब पुस्तक प्रारंभ की तो कथानक पूर्णतः भिन्न पाया एवं  मध्य तक पहुंचते तक कहानी का जो मोड़ वे लेकर आए वह उनके इस उपन्यास को लिखने के मूल भाव की ओर ले जाता है जिसे  प्रारंभ में समझना तो दूर सोच पाना भी पाठक के लिए संभव नहीं होगा।

कहानी बेहद रोचकता के साथ मीडिया जगत की प्रतिस्पर्धा एवं कठिनाइयों को बखूबी दर्शाती है साथ ही समाज में व्याप्त अंध विश्वास एवं आस्था के दुष्प्रभावों पर भी करारी चोट की गई है। पुस्तक के कथानक के विषय में और अधिक कहना उचित प्रतीत नहीं होता क्यूंकी उस से पाठक को प्राप्त होने वाले आनंद का ह्रास  संभव ही नहीं सुनिश्चित होगा।

कथानक वास्तविकता से बेहद करीब है एवं कहीं भी ऐसा प्रतीत नहीं होता की आम कहानियों की तरह कथानक में असंभव को संभव बना कर दर्शाया जा रहा है ।

कथानक एक पत्रकार की कहानी है जो किसी विशेष मकसद के लिए घटनाओं का ऐसा तानाबाना बुनता है जिसमें हर खासोआम शामिल हो जाते है साथ ही घटनाओं का सिलसिलेवार व्यापक वर्णन अत्यंत सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है । 

कुछ हद तक यह कथानक एक मुख्य कारण तक पहुंचने के  लिए कथानक के नायक पत्रकार द्वारा कुछ अन्य घटनाओं का सहारा लेकर आगे बढ़ना एवंम  अंततः अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेना शामिल है । 

कहानी में कहीं भी बोझिलता नहीं आने पाई एवं सीमित पात्रों के साथ वे अत्यंत रोमांचक कथानक प्रस्तुत कर सके हैं जो स्वयं को किसी विशेष धारा यथा जासूसी या सामाजिक या पारिवारिक कहानी से अलग रखते हुए  रोचकता बनाए रखता है ।  

उपन्यास के उतार चढ़ाव सहज ही पाठक  को दृश्य से जोड़ते चलते हैं एवं कथानक की हर घटना को सहज महसूस करते हैं । 

साफ सुथरी कहानी है जो स्तरीय वाक्य  संयोजन एवं प्रस्तुति के कारण विशिष्ठ बन जाती है। पुस्तक की समाप्ति के पश्चात भी पाठक स्वयं को कहीं न कहीं स्वयं को उसी पुस्तक के पात्रों के बीच पाते हैं ।

कहानी का अंत अवश्य ही कुछ शीघ्रता से समेटने जैसा है,  मेरे विचार से उसे कुछ विस्तार देना और रोचक एवं प्रभावी हो सकता था क्योंकि यह बात सहज प्रतीत नहीं होती की आज के राजनैतिक संरक्षण एवं अपराध जगत के वर्चस्व के बीच आप किसी बड़ी शक्ति अथवा किसी शक्तिशाली प्रभावी पहुंच वाले व्यक्ति से संबंधित उसके काले कारनामों को सार्वजनिक करें किंतु उसका कहीं भी कुछ प्रभाव नजर न आए।



  अंत को कुछ मार्मिकता पूर्ण बना कर पेश किया है किंतु उसकी कितनी आवश्यकता थी यह पाठक स्वयं निर्णय कर सकते हैं मेरी दृष्टि में वह पूर्णतः अनावश्यक ही था एवं कथानक के प्रभाव को समाप्त कर पाठक का मन दूसरी ओर मोड़ देता है ।

अंत में मेरी राय में भरत जी का बेहद सफल प्रयास है तथा किसी को भी इसे पढ़ कर निराशा नहीं होगी व स्वस्थ मनोरंजन तो अवश्य ही प्राप्त होगा।

         समीक्षक atulya khare                                                                                                                                  

 अतुल्य खरे 

नई पीढ़ी के लेखक भरत गढवी जी के कथानक में नई सोच नए अंदाज देखने में आते हैं उबके लेखन में एक ताजगी मिलती है उनकी अन्य रचनाओं की समीक्षा पढ़ने के लिए पुस्तक के नाम पर क्लिक करें 

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